Friday, 28 May 2021

नए नौकरी या व्यवसाय किस दिन शुरू करने से लाभ मिलेगा

नई नौकरी कब शुरू करें, 

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ये हैं खास कामों के लिए शुभकिस दिन कौन सा काम करना होता है शुभ और कौन सा काम करना होता है अशुभ...

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रविवार को करना चाहिए ये काम

औषधि यानी दवाइयों का सेवन का शुरू कर सकते हैं, सवारी, वाहन, नौकरी, पशु खरीदी, यज्ञ, पूजन, अस्त्र-शस्त्र-वस्त्र की खरीदी, धातु की खरीदी, वाद-विवाद के लिए सलाह लेना शुभ है।

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सोमवार को कर सकते हैं ये काम

कृषि संबंधी यंत्र खरीदी, बीज बोना, बगीचे में फल के वृक्ष लगाना, वस्त्र तथा रत्न धारण करना, क्रय-विक्रय करना, भ्रमण- यात्रा, कला कार्य, स्त्री-प्रसंग, नए काम की शुरुआत, आभूषण धारण करना, पशुपालन के लिए सोमवार शुभ होता है।


मंगलवार को करना चाहिए ये काम

जासूसी कार्य, भेद लेना, ऋण देना, गवाही देना, अग्नि संबंधी कार्य, सेना-युद्ध और नीति से संबंधी काम, वाद-विवाद का निर्णय करना, साहसिक कार्य आदि के लिए मंगलवार के लिए शुभ है। मंगलवार को ऋण लेना शुभ नहीं है।


बुधवार को कर सकते हैं ये काम

ऋण देना, शिक्षा-दीक्षा संबंधित काम, विद्या की शुरुआत, बहीखाता बनाना, हिसाब करना, शिल्प कार्य, निर्माण कार्य, नोटिस देना, गृहप्रवेश करना, राजनीति से संबंधित काम के लिए बुधवार शुभ है।


गुरुवार को करना चाहिए ये काम

ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा लेना, धर्म न्याय संबंधित काम, यज्ञ-अनुष्ठान करना, कला संबंधित शिक्षा का आरंभ करना, गृह शांति पूजन करना, मांगलिक कार्य, नया पद ग्रहण करना, आभूषण धारण करना, यात्रा, नए वाहन का चालन, औषधि सेवन की शुरुआत करना व निर्माण कार्य की शुरुआत के लिए गुरुवार शुभ है।


शुक्रवार को कर सकते हैं ये काम

पारिवारिक काम की शुरुआत करना, गुप्त बातों पर विचार करना, प्रेम व्यवहार, मित्रता, वस्त्र धारण करना, मणि रत्न धारण करना, निर्माण कार्य की शुरुआत, इत्र, नाटक, फिल्म, संगीत संबंधित काम की शुरुआत के लिए शुक्रवार शुभ है। साथ ही, अनाज भंडार भरना, खेती करना, धान्य रोपण, शिक्षा प्राप्ति के लिए भी ये दिन शुभ है।


शनिवार को करना चाहिए ये काम

नए घर में प्रवेश करना, नौकर रखना, धातु मशीनरी से संबंधित काम, गवाही देना, नया व्यापार प्रारंभ करना, वाद-विवाद का निपटारा, वाहन खरीदना आदि कार्य शनिवार को किए जा सकते हैं। बीज बोना, कृषि संबंधित काम शनिवार से प्रारंभ नहीं करना चाहिए।

🙏जय मां वैष्णोदेवी जी की 🙏

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Tuesday, 25 May 2021

सीढ़ी से संबंधित वास्तु दोष कैसे ठीक करें

 घर की सीढ़ियों में अगर है वास्तु दोष तो इन उपायों से करें दूर



वास्तु शास्त्र का मानना है कि हमारे आसपास मौजूद हर चीज दिशा के अनुसार सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा पैदा करती है जिसका असर हमारे और आपके जीवन पर ऊर्जा के स्वभाव के अनुसार पड़ता है। 


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 आज हम इस लेख में आपको उन्हीं वास्तु नियमों की जानकारी देंगे जो सीढ़ी से जुड़े हैं। साथ ही हम आपको ये भी बताएँगे कि अगर आपके घर की सीढ़ियों में वास्तु दोष है तो उसका क्या उपाय किया जा सकता है।


सीढ़ियों को लेकर वास्तु शास्त्र के नियम

पहला नियम : वास्तु शास्त्र के मुताबिक घर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में सीढ़ियों का होना शुभ माना गया है। वहीं उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर सीढ़ियों का रुख हो तो यह भी बेहद शुभ है। 


दूसरा नियम : यदि आपके घर में दक्षिण-पूर्व दिशा में सीढ़ी मौजूद है तो यह अशुभ फल देता है। जिस भी घर में इस दिशा में सीढ़ी होती है उस घर के बच्चे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित रहते हैं। ऐसे में यदि आपके घर में दक्षिण पूर्व दिशा में कोई सीढ़ी मौजूद है तो आप उस सीढ़ी की शुरुआत में एक और सीढ़ी को जोड़ कर उसे एक अलग दिशा में मोड़ दें, इससे उस सीढ़ी का वास्तु दोष खत्म हो जाएगा।


तीसरा नियम : यदि आपके घर में उत्तर पूर्व दिशा यानी कि ईशान कोण में सीढ़ी हो तो यह बहुत ही चिंता का विषय है। ऐसे घर जहां इस दिशा में सीढ़ियाँ होती हैं वहाँ उस घर के स्वामी का उत्थान रुक जाता है। आर्थिक समस्याएं होने लगती हैं और मानसिक तनाव बढ़ जाता है। अगर आपके घर में भी इस दिशा में सीढ़ी हो तो आप या तो इस दिशा की सीढ़ी को तुड़वा कर उसे दूसरी दिशा में मोड़ दें या फिर अगर आप ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं तो फिलहाल उस सीढ़ी के सामने उगते सूर्य या फिर सूरजमुखी की कोई तस्वीर लगा दें। आप ऐसी सीढ़ी के सामने शीशा भी लगा सकते हैं।


चौथा नियम : कुछ लोग स्वयं निचले तले पर रहते हैं और ऊपरी तलों पर किराएदार को रखते हैं। ऐसे में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि ऊपरी तले पर जाने वाली सीढ़ियाँ आपके मुख्य द्वार के ठीक सामने न हो। जिस घर में ऐसा होता है वहाँ मकानमालिक की तरक्की रुक जाती है और किराएदार की तरक्की होने लगती है। ऐसे में यदि आपके घर में भी इस तरह से सीढ़ियाँ मौजूद हैं तो या तो आप अपना मुख्य द्वार बदल लें या फिर सीढ़ी और मुख्य द्वार के बीच में कोई डिवाइडर जैसा अवरोध उत्पन्न करें।


पांचवा नियम : यदि आपके घर में पूर्व दिशा में कोई सीढ़ी है तो इस बात का ध्यान रखें कि यह सीढ़ी पूर्व दिशा में मौजूद दीवार से सटी हुई न हो। सीढ़ी और दीवार के बीच कम से कम तीन इंच की दूरी अवश्य होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो पूर्व दिशा की दीवार पर पंचमुखी हनुमान जी की एक तस्वीर लगा कर आप इस वास्तु दोष को खत्म कर सकते हैं।


वास्तु अनुसार सीढ़ियों से जुड़ी कुछ अहम बातें

सीढ़ी के नीचे कभी भी जूते-चप्पल या फिर कबाड़ का सामान नहीं रखना चाहिए। इससे घर की लक्ष्मी रुष्ट होती है और घर के स्वामी को धन संचय करने में समस्या का सामना करना पड़ता है।

सीढ़ी के नीचे कभी भी कोई मंदिर या शौचालय न बनवाएँ। इससे घर का सौभाग्य खत्म होता है और परिवार के सदस्यों के बीच कलह शुरू हो जाते हैं।

घर की सीढ़ियाँ हमेशा सम संख्या में होनी चाहिए। यदि आपके घर में ऐसा नहीं है तो सीढ़ी के अंतिम सिरे में एक छोटी सीढ़ी का निर्माण कर सीढ़ियों की संख्या सम कर सकते हैं।

घुमावदार सीढ़ियों को वास्तु शास्त्र में गलत माना गया है इसलिए हमेशा सीधी सीढ़ियाँ ही बनवाएँ।

सीढ़ियों के आरंभ और अंत में हमेशा द्वार रखें। अगर घर की सीढ़ियों में इसके बाद भी कोई वास्तु दोष है तो बरसात के मौसम में मिट्टी के मटके में बरसात का पानी जमा कर के सीढ़ी के नीचे गार दें, इससे सीढ़ियों का वास्तु दोष खत्म हो जाता है।

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Saturday, 22 May 2021

मोहिनी एकादशी व्रत कैसे करें

 

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● एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

● इसके पश्चात कलश स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा करें।

● दिन में मोहिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें अथवा सुनें।

● रात्रि के समय श्री हरि का स्मरण करें और भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें।

● द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण करें।

● सर्वप्रथम भगवान की पूजा कर ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजनादि कराएं और उन्हें दान दक्षिणा देें।

● इसके पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करें।


मोहिनी एकादशी का महत्व


पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन हुआ तो अमृत प्राप्ति के बाद देवताओं व असुरों में आपाधापी मच गई थी। ताकत के बल पर देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे इसलिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोह माया के जाल में फांसकर सारा अमृत देवताओं को पिला दिया जिससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। इस कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा गया।



मोहिनी एकादशी व्रत कथा


भद्रावती नामक सुंदर नगर में धनपाल नामक एक धनी व्यक्ति रहता था। वह स्वभाव से बड़ा ही दानपुण्य करने वाला व्यक्ति था। उसके पाँच पुत्रों में सबसे छोटे बेटे का नाम धृष्टबुद्धि था जो बुरे कर्मों में अपने पिता का धन लुटाता रहता था। एक दिन धनपाल ने उसकी बुरी आदतों से तंग आकर उसे घर से निकाल दिया। अब वह दिन-रात शोक में डूब कर इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। महर्षि गंगा में स्नान करके आए थे।



धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित होकर कौण्डिल्य ऋषि के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ‘‘ऋषि ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा उपाय बताएं जिसके पुण्य के प्रभाव से मैं अपने दुखों से मुक्त हो जाऊँ।’ तब कौण्डिल्य बोले, मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्घि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया। जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर श्री विष्णुधाम को चला गया।


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Tuesday, 4 May 2021

लग्न कुण्डली अनुसार कौन सा रत्न धारण करें

 

लग्न कुंडली के अनुसार कौन से भाव का रत्न पहने :- Vastu Guru ✋☯️ Mkpoddar . WhatsApp करें

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लग्न कुंडली के अनुसार 

लग्न भाव , पंचम भाव और नवम भाव के रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या श‍त्रु क्षेत्री हो उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है। जो ग्रह शुभ होने के साथ कमजोर है उन्हें रत्न द्वारा बल दिया जाता है , और जो ग्रह कुंडली में अशुभ है जैसे 3, 6, 8, 12 भाव के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए। इनको शांत रखने के लिए उपाय किया जाता है ।
रत्न पहनने के लिए दशा-महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र या त्रिकोण के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।
आप को रत्न के अनुसार उस ग्रह के लिए निहित वार वाले दिन शुभ घड़ी में रत्न पहना जाता है। पहनने से पहले रत्न को मंत्र जाप करके रत्न को सिद्ध करें, तत्पश्चात इष्ट देव का स्मरण कर रत्न को धूप-दीप दिया तो उसे प्रसन्न मन से धारण करें।
रत्न सबके लिए नहीं होते। वे सुंदरता की वस्तु न होकर प्राणवान ऊर्जा के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। लेकिन उनका चयन अपने लिए अपने लग्न की राशि के अनुसार करना चाहिए, अन्यथा प्रतिकूल रत्न किसी भी सीमा तक प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। रत्न बड़े प्रभावशाली होते हैं। यदि लग्नेश व योगकारक ग्रहों के रत्नों को अनुकूल समय में उचित रीति से जाग्रत कर धारण किया जाए तो वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। रत्न विशेष की अंगूठी निर्धारित धातु में बनवाकर धारण करने से विशेष लाभ होता है।

जानिए लग्न के अनुसार शुभ रत्न :-💎
💎मेष: इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है जिसको शुक्ल पक्ष में किसी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ भौं भौमाय नमः लाभ- मूंगा धारण करने से रक्त साफ होता है और रक्त, साहस और बल में वृद्धि होती है, महिलाओं के शीघ्र विवाह मंे सहयोग करता है, प्रेत बाधा से मुक्ति दिलाता है। बच्चों में नजर दोष दूर करता है। वृश्चिक लग्न वाले भी इसे धारण कर सकते हैं।

💎वृष: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न हीरा तथा राजयोग कारक रत्न नीलम है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः लाभ- हीरा धारण करने से स्वास्थ्य व साहस प्रदान करता है। समझदार बनाता है। शीघ्र विवाह कराता है। अग्नि भय व चोरी से बचाता है। महिलाओं में गर्भाशय के रोग दूर करता है। पुरुषों में वीर्य दोष मिटाता है। कहा गया है कि पुत्र की कामना रखने वाली महिला को हीरा धारण नहीं करना चाहिए अतः वे महिलाएं जो पुत्र संतान चाहती हैं या जिनके पुत्र संतान है उन्हें परीक्षणोपरांत ही हीरा धारण करना चाहिए। इसे तुला लग्न वाले जातक भी धारण कर सकते हैं।

💎मिथुन: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न पन्ना है जिसे बुधवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर पहनना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः लाभ- पन्ना निर्धनता दूर कर शांति प्रदान करता है। परीक्षाओं में सफलता दिलाता है। खांसी व अन्य गले संबंधी बीमारियों को दूर करता है। चंचल चिŸावृŸिायों को शांत करता है। इसके धारण करने से एकाग्रता विकसित होती है। काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों को दूर करके अत्यंत शांति दिलाता है। कन्या लग्न वाले जातक भी इसे धारण कर सकते हैं।

💎कर्क: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न मोती है जिसे सोमवार के दिन प्रातः चंद्र की होरा में पहनना चाहिए। पहनने के पहले रत्न को इस मंत्र से अवश्य जाग्रत कर लेना चाहिए। मंत्र- ऊँ सों सोमाय नमः लाभ- मोती धारण करने से स्मरण शक्ति प्रखर होती है। बल, विद्या व बुद्धि में वृद्धि होती है। क्रोध व मानसिक तनाव शांत होता है। अनिद्रा, दांत व मूत्र रोग में लाभ होता है। पुरुषों का विवाह शीध्र कराता है तथा महिलाओं को सुमंगली बनाता है। इस लग्न वाले यदि मूंगा भी धारण करें तो अत्यंत लाभ देता है क्योंकि मूंगा इस लग्न वाले व्यक्ति का राजयोग कारक रत्न होता है।

💎सिंह: इस लग्न वाले जातकांे का अनुकूल रत्न माणिक्य है। इसे रविवार को प्रातः रवि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ घृणि सूर्याय नमः लाभ- माणिक्य धारण करने से साहस में वृद्धि होती है। भय, दुःख व अन्य व्याधियों का नाश होता है। नौकरी में उच्चपद व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अस्थि विकार व सिर दर्द की समस्या से निजात मिलती है। इस लग्न वाले व्यक्ति यदि मूंगा भी धारण करें तो अत्यंत लाभ देता है। क्योंकि इस लग्न वाले व्यक्ति का मूंगा राजयोग कारक रत्न होता है।

💎कन्या :- इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न पन्ना है जिसे बुधवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर पहनना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः , इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा . नीलम रत्न शुभ होता है
💎तुला :- इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न हीरा तथा राजयोग कारक रत्न नीलम है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः, हीरा , ओपेल
💎वृश्चिक :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है जिसको शुक्ल पक्ष में किसी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ भौं भौमाय नमः
💎धनु: इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न पुखराज है जिसे शुक्ल पक्ष के किसी गुरुवार को प्रातः गुरु की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः लाभ: पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, ज्ञान, यज्ञ व मान-सम्मान में वृद्धि होती है। पुत्र संतान देता है। पापकर्म करने से बचाता है। अजीर्ण प्रदर, कैंसर व चर्मरोग से मुक्ति दिलाता है।
💎मकर :-इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न नीलम है जिसे शनिवार के दिन प्रातः शनि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराये नमः लाभ- नीलम धारण करने से धन, सुख व प्रसिद्धि में वृद्धि करता है। मन में सद्विचार लाता है। संतान सुख प्रदान करता है। वायु रोग, गठिया व हर्निया जैसे रोग में लाभ देता है। नीलम को धारण करने के पूर्व परीक्षण अवश्य करना चाहिए।

नीलम धारण करने से पूर्व कुशल ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए।
💎कुम्भ :- -इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न नीलम है जिसे शनिवार के दिन प्रातः शनि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराये नमः लाभ- नीलम धारण करने से धन, सुख व प्रसिद्धि में वृद्धि करता है।
💎मीन :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न पुखराज है जिसे शुक्ल पक्ष के किसी गुरुवार को प्रातः गुरु की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः

✋मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ व मीन लग्न वाले जातक पुखराज धारण कर सकते हैं।✋ वृष, कर्क, सिंह, तुला और मकर लग्न वाले जातक पुखराज धारण न ही करें तो अच्छा है।

✋मेष लग्न वाले जातकों को भी वर्जित है परंतु यदि गुरु जन्म कुंडली के प्रथम, पंचम व नवम भावस्थ हो तो धारण करें। अच्छा है। जिस कन्या का विवाह न हो रहा हो उसे अवश्य धारण करना चाहिए परंतु उसकी लग्न या राशि, धनु या मीन होनी चाहिए।

💎रत्न सारणी लग्न स्वामी ग्रह रत्न धातु मित्र रत्न शत्रु रत्न
💎मेष, वृश्चिक मंगल मूंगा सोना माणिक्य, मोती, पुखराज पन्ना 💎वृष, तुला शुक्र हीरा सोना पन्ना, नीलम माणिक्य, मोती 💎मिथुन, कन्या बुध पन्ना सोना/ कांसा माणिक्य, हीरा मोती 💎कर्क चंद्रमा मोती चांदी माणिक्य, पन्न्ना -
💎सिंह सूर्य माणिक्य सीसा मोती, मूंगा, पुराखराज म ा िण् ा क् य , मोती, मंूगा 💎मकर, कुंभ शनि नीलम लोहा/ सीसा पन्ना, हीरा म ा िण् ा क् य , मोती, मूंगा💎 धनु, मीन गुरु पुखराज सोना/ चांदी मोती, मूंगा, माणिक्य हीरा, नीलम रत्न धारण करने में ✋हाथ का चयन: चिकित्सा शास्त्र की मान्यता है कि पुरुष का दायां हाथ व महिला का बांया हाथ गर्म होता है। इसी प्रकार पुरुष का बांया हाथ व महिला का दांया हाथ ठंडा होता है। रत्न भी अपनी प्रकृति के अनुसार ठंडे व गर्म होते हैं। यदि ठंडे रत्न, ठंडे हाथ में व गर्म रत्न गर्म हाथ में धारण किये जाएं तो आशातीत लाभ होता है। प्रकृति के अनुसार गर्म रत्न -☀️ पुखराज, हीरा, माणिक्य, मूंगा। प्रकृति के अनुसार 🌜ठंडे रत्न - मोती, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। रत्न मर्यादा- रत्न को धारण करने के बाद उसकी मर्यादा बनायी रखनी चाहिए। अशुद्ध स्थान, दाह-संस्कार आदि में रत्न पहन कर नहीं जाना चाहिए। यदि उक्त स्थान में जाना हो तो उसे उतार कर देव-स्थान में रखना चाहिए तथा पुनः निर्धारित समय में धारण करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रत्न शुक्ल पक्ष के दिन निर्धारित वार की निर्धारित होरा में धारण किये जाएं। खंडित रत्न कदापि धारण नहीं करना चाहिए।

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नौकरी या व्यवसाय में लाभ होगा कुंडली से जानें

 नौकरी या व्यवसाय? में लाभ होगा अंत तक पढ़ें www.asthajyotish.in यदि जातक की कुंडली के दशम भाव में चर राशि (1, 4, 7, 10) स्थित है तो ऐसा जात...