Saturday, 12 September 2020

अंकज्योतिष ओर आपका नाम

 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मराशि के


 नक्षत्रचरणानुसार दिए गए नामाक्षर से ही नामकरण होना चाहिए। बहुत से लोगों का यह मानना है कि हमें अपनी जन्मराश्यानुसार अपना नाम नहीं रखना चाहिए अन्यथा जादू टोना करने वाले लोगों को हमारे ग्रह नक्षत्रों की गति का अनुमान होने से हमें नुकसान हो सकता है। परंतु यथार्थ में यदि हमें अपनी जन्मपत्री के वास्तविक शुभ फल को प्राप्त करना है तो हमें अपने नाम के आदि अक्षर का चयन जन्म राशि नक्षत्र चरणानुसार ही करना चाहिए।

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यदि हमें नक्षत्रचरणानुसार अक्षर पसंद नहीं आ रहे हैं तो राशि अक्षर ले लेना चाहिए। यदि यह भी पसंद न हो तो हमें मित्र राशि के अक्षरानुसार नाम रखना चाहिए। ज्योतिष में नाम के केवल प्रथम अक्षर को ही महत्व दिया गया है। शायद इसीलिए एकता कपूर के धारावाहिक अधिकतर ‘क’ अक्षर से आरंभ होने वाले नाम के ही होते हैं।

अंक शास्त्र में नामांक का विशेष महत्व है। अंक शास्त्र का वैज्ञानिक आधार जन्म दिनांक के पीछे काम करने वाला वाइब्रेशन होता है। अंक शास्त्र में मूलांक व भाग्यांक का हमारे व्यक्तित्व पर असर पड़ता है। यदि नाम का भी इन अंकों के साथ रेजोनेन्स होता है तो हमें शुभ फल प्राप्त होते हैं अन्यथा नाम प्रभावहीन हो जाता है।

नाम में तीन महत्वपूर्ण अंक होते हैं। पहला नामाक्षर यानि जिस अक्षर से नाम आरंभ हो रहा है उस अक्षर का अंक। इसके अतिरिक्त आपके नाम के योग का अंक अर्थात नामांक। अंत में आपके पूर्ण नाम का योग अर्थात पूर्ण नामांक।

नाम का चयन करते हुए नामांक तक पहुंचने की प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखना परमावश्यक होता है कि आपका नामांक आपका मूलांक या भाग्यांक अथवा उनका मित्रांक हो अन्यथा उसकी वाईब्रेशन आपको अधिक बेहतर परिणाम नहीं दे सकेगी। पाठकों की सुविधा हेतु कीरो द्वारा दी गई अंकों के मित्रांक व उनके अक्षरों की तालिका इस प्रकार है -

अंकमित्रांकअक्षरअंकमित्रांकअक्षरअंकमित्रांकअक्षर
12,4,7A,I,J,Q,Y41,2,7,8D,M,T71,2,4O,Z
21,4,7B,K,R56E,H,N,X84F,p
36,9C,G,L,S63,9U,V,W93,6-

नाम बदलने या नाम में सूक्ष्म परिवर्तन करने का कारण साधारण नहीं है अपितु इसके लिए लोशु ग्रिड का अध्ययन किया जाता है जिसकी यह अवधारणा सर्वमान्य है कि आपकी जन्मतारीख में से जो अंक विलुप्त है उसका अधिकाधिक प्रयोग आपके नाम की वर्तनी में किया जाए। यदि विलुप्त अंक आपका भाग्यांक हो तो इस विलुप्त अंक को आपका नामांक भी बनाया जा सकता है।

लोशु ग्रिड
492
357
816

अतः नामकरण के लिए सर्वप्रथम पहला अक्षर राशि अनुरूप चुनें जो मूलांक का भी मित्र हो। पुनः नामांक व पूर्ण नामांक को अपने मूलांक व भाग्यांक के अनुरूप चुनंे। ये नामांक ऐसे चुनें जिससे लोशु ग्रिड के खाली स्थान भर सकें और हमारे व्यक्तित्व की कमी के पूरक बन सकें।

ध्यान रखें कि नक्षत्र व चरण आदि के ज्ञान के लिए जन्म तारीख व समय की जानकारी होना आवश्यक है। यदि समय का ज्ञान न हो तो भी राशि का ज्ञान जन्मतारीख से हो सकता है। यदि जन्म तारीख भी न मालूम हो तो ज्योतिष व अंक शास्त्र दोनों ही नामकरण के लिए व्यर्थ हैं। दोनों शास्त्रों में हमारा ध्येय नाम को जन्म दिवस के अनुरूप बनाना ही है।


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उदाहरण -

इंदिरा गांधी की जन्म तिथि: 19 नवंबर 1917, समय: 23: 11, स्थान: इलाहाबाद है। इसके अनुसार उनकी राशि मकर, नक्षत्र - उत्तराषाढ़ा, चरण तृतीय था। अवकहड़ा चक्र अनुसार उनका नामाक्षर ‘जा’ जैसे जावित्री होता है। लेकिन उनका प्रसिद्ध नाम इंदिरा गांधी था। ‘इ’ अक्षर कृतिका नक्षत्र द्वितीय चरण, वृष राशि को दर्शाता है। वृष राशि मकर राशि की मित्र राशि है। अतः ‘इ’ अक्षर का प्रभाव भी सकारात्मक ही है।

इंदिराजी की जन्म तारीख से इनका मूलांक 1 व भाग्यांक 3 बनता है। उनका नामाक्षर प् एवं नामाक्षरांक 1 होता है जो उनका मूलांक भी है। अर्थात नामाक्षरांक की मूलांक से पूर्ण वाईब्रेशन है। इंदिराजी का नामाक्षर निम्न है:

I N d I R A G A N d H I
1 5 4 1 2 1 3 1 5 4 5 1

14 (नामांक - 5) + 19 = 33 = (3 + 3)
= 6 ( पूर्ण नामांक)

अतः नामांक 5 हुआ एवं पूर्ण नामांक 6 हुआ। नामांक 5 भी मूलांक 1 से मित्रवत संबंध रखता है एवं पूर्ण नामांक 6 भाग्यांक 3 का मित्रांक है। अतः उनका नाम उनके लिए उत्तम है। इस तिथि के मुताबिक इनका लोशु ग्रिड इस प्रकार का बनता है -

इंदिराजी की जन्म तारीख में अंक 1 की पुनरावृत्ति बार-बार हुई है जिसके कारण ये कुशल प्रशासक सिद्ध हुईं। अंक 9 ने इन्हें निर्भीक बनाया। इनके लोशु ग्रिड से कुछ महत्वपूर्ण अंक जैसे 5, 3 व 6 विलुप्त हैं। परंतु यदि इनके नाम का अध्ययन अंक शास्त्र की परिधि में किया जाये तो हम देखते हैं कि इनके प्रसिद्ध नाम का अंक 5 आता है।

इंदिरागांधी का लोशु ग्रिड
-9, 9-
- 7
-1, 1, 1, 1, 16

पूरे नाम के अंकों का जोड़ 33 है जिसके फलस्वरूप नाम के युग्मांक में दोहरे गुरु का प्रभाव है। पूर्ण नामांक 6 आ रहा है। इसलिए अंक 6 की कमी की भी पूर्णतया पूर्ति हो रही है। इसीलिए इंदिरा जी सर्वश्रेष्ठ वक्ता तथा शिक्षा व ज्ञान के स्तर पर अत्यंत विदुषी व प्रभावशाली प्रशासक थीं।

इन्होंने कठिन से कठिन परिस्थिति में अपने मानसिक संतुलन को नहीं खोया। इनके नाम के युग्मांक में दोहरे गुरु व जन्मतिथि से प्राप्त होने वाले गुरु के अंक 3 से ही इनके अंदर अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा थी। इनके नामांक में अंक 5, 3 व 6 का सुंदर समन्वय है। इसीलिए इनका भाषा पर पूर्ण अधिकार था तथा इन्होंने हमेशा बिना पढ़े प्रभावशाली भाषण दिये।

इस प्रकार से हम देखते हैं कि अंक कुंडली में यदि कोई अंक विलुप्त हो तो नाम की वर्तनी में सूक्ष्म परिवर्तन द्वारा हम विलुप्त अंकों की वाइब्रेशन को प्राप्त करके जातक के भाग्य में परिवर्तन कर सकते हैं। नाम बदलने से या नाम की वर्तनी में परिवर्तन करने से भाग्य में बदले हुए नामांक के प्रभाव से हमाॅरा भाग्य परिवर्तित हो सकता है।

Saturday, 5 September 2020

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र मात्र से ही सभी कार्य में सफलता प्राप्त करें

 सिद्धकुंजिका स्तोत्र (siddh kunjika stora) 


देवी माहात्म्य के अंतर्गत परम कल्याणकारी स्तोत्र है। 

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यह स्तोत्र रुद्रयामल तंत्र के गौरी तंत्र भाग से लिया गया है। सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ पूरी दुर्गा सप्तशती के पाठ के बराबर है। इस स्तोत्र के मूल मन्त्र नवाक्षरी मंत्र ( ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) के साथ प्रारम्भ होते है। कुंजिका का अर्थ है चाबी (key) अर्थात कुंजिका स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की शक्ति को जागृत करता है जो महेश्वर शिव के द्वारा गुप्त (lock) कर दी गयी है। इस स्तोत्र के पाठ के उपरान्त किसी और जप या पूजा की आवश्यकता नहीं होती, कुंजिका स्तोत्र के पाठ मात्र से सभी जाप सिद्ध हो जाते है। कुंजिका स्तोत्र में आए बीजों (बीज मन्त्रो) का अर्थ जानना न संभव है और न ही अतिआवश्यक अर्थात केवल जप पर्याप्त है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र इस प्रकार है:-


शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ।।१।।

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ।।२।।

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।।३।।

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तंभोच्चाटनादिकम।
पाठमात्रेण संसिध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।।४।।

अथ मंत्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।

। इति मंत्रः ।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।१।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।२।।

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते।।३।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।४।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।५।।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ।।६।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।७।।

पां  पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।८।।

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।

यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
।। ॐ तत्सत्।।

अर्थ ( Meaning ) -

शिव जी बोले-
  देवी !सुनो। मैं उत्तम कुंजिका स्तोत्र का  उपदेश करूँगा, जिस मन्त्र के प्रभाव से देवी का जप ( पाठ ) सफल होता है ।।१।।

कवचअर्गलाकीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है ।।२।।
  केवल कुंजिका के पाठ से दुर्गापाठ का फल प्राप्त हो जाता है। ( यह कुंजिका ) अत्यंत गुप्त और देवों के लिए भी दुर्लभ है ।।३।।
  हे पार्वती !  स्वयोनि की भांति प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। यह उत्तम कुंजिकास्तोत्र केवल पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि ( अभिचारिक ) उद्देश्यों को सिद्ध करता है ।।४।।
   मन्त्र -ॐ  ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।

( मंत्र में आये बीजों का अर्थ जानना न संभव है, न आवश्यक और न ही वांछनीय (Desirable)। केवल जप पर्याप्त है। )
  हे रुद्ररूपिणी ! तुम्हे नमस्कार। हे मधु दैत्य को मारने वाली ! तुम्हे नमस्कार है। कैटभविनाशिनी को नमस्कार। महिषासुर को मारने वाली देवी ! तुम्हे नमस्कार है ।।१।।
  शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भ को मारने वाली ! तुम्हे नमस्कार है ।।२।।
  हे महादेवी ! मेरे जप को जाग्रत और सिद्ध करो। 'ऐंकार' के रूप में सृष्टिरूपिणी, 'ह्रीं' के रूप में सृष्टि का पालन करने वाली ।।३।।
  क्लीं के रूप में कामरूपिणी ( तथा अखिल ब्रह्माण्ड ) की बीजरूपिणी देवी ! तुम्हे नमस्कार है। चामुंडा के रूप में तुम चण्डविनाशिनी और 'यैकार' के रूप में वर देने वाली हो ।।४।।
  'विच्चे' रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो। ( इस प्रकार ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) तुम इस मन्त्र का स्वरुप हो ।।५।।
  'धां धीं धूं' के रूप में धूर्जटी ( शिव ) की तुम पत्नी हो। 'वां वीं वूं' के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। 'क्रां क्रीं क्रूं' के रूप में कालिकादेवी, 'शां शीं शूं' के रूप में मेरा कल्याण करो ।।६।।
  'हुं हुं हुंकार' स्वरूपिणी, 'जं जं जं' जम्भनादिनी, 'भ्रां भ्रीं भ्रूं' के रूप में हे कल्याणकारिणी भैरवी भवानी ! तुम्हे बार बार प्रणाम ।।७।।
  'अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं' इन सबको तोड़ो और दीप्त करो, करो स्वाहा। 'पां पीं पूं' के रूप में तुम पार्वती पूर्णा हो। 'खां खीं खूं' के रूप में तुम खेचरी ( आकाशचारिणी ) अथवा खेचरी मुद्रा हो।।८।।
  'सां सीं सूं' स्वरूपिणी सप्तशती देवी के मन्त्र को मेरे लिए सिद्ध करो। यह सिद्धकुंजिका स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिए है। इसे भक्तिहीन पुरुष को नहीं देना चाहिए। हे पार्वती ! इस मन्त्र को गुप्त रखो। हे देवी ! जो बिना कुंजिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक होता है।
( इस प्रकार श्रीरुद्रयामल के गौरीतंत्र में शिव पार्वती संवाद में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ )
सम्पर्क सूत्र:- Astha Jyotish Asansol.
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नौकरी या व्यवसाय में लाभ होगा कुंडली से जानें

 नौकरी या व्यवसाय? में लाभ होगा अंत तक पढ़ें www.asthajyotish.in यदि जातक की कुंडली के दशम भाव में चर राशि (1, 4, 7, 10) स्थित है तो ऐसा जात...